स्पेशल रिपोर्ट : मध्यप्रदेश में लोगों को न स्वच्छ पानी मिल रहा न हवा, सामने आई सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन में भारी लापरवाही! जानिए जमीनी हकीकत

भोपाल से दीपेश वर्मा की रिपोर्ट। पंचायत इंडिया न्यूज़

भोपाल। मध्यप्रदेश में नदियों को निर्मल बनाने और पर्यावरण का प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सरकार ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की है। लेकिन योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही और भर्राशाही के कारण मप्र के लोगों को न स्वच्छ पानी मिल पा रहा है और न ही हवा। मप्र की जीवन रेखा नर्मदा को साफ-स्वच्छ बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तब भी शहरों का गंदा पानी मिल रहा है। नर्मदापुरम व खरगोन जैसे जिलों के कई घाटों पर तो सीवरेज तक मिल जाता है। उधर शहरों में स्वच्छ हवा के नाम पर केंद्र ने भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों को करोड़ रुपए दिए। तब भी भोपाल व ग्वालियर की हवा प्रदूषित हो रही है। ठंड के सीजन में इसके परिणाम भी दिखाई देते हैं। इन शहरों में हवा की गुणवत्ता बताने वाला एयर क्वालिटी इंडेक्स प्रदूषण बढ़ते ही 300 से 400 के बीच पहुंच जाता है, जो कि 50 से 100 के बीच होना चाहिए।जानकारी के अनुसार, सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन में भर्राशाही और लापरवाही की यह स्थिति गत वर्ष अक्टूबर माह में उस समय आई जब कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थ। 7 व 8 अक्टूबर 2025 में हुई कलेक्टर-कमिश्नर कांफ्रेंस में सामने आई चौंकाने वाली स्थिति के बाद चिह्नित कमियों को दूर करने से जुड़े कामों की गत 21 जनवरी समीक्षा की तब भी कई पिछड़े जिले कमियों को दूर करने में सफल नहीं हुए।

महत्वाकांक्षी योजनाओं पर जिलों का परफार्मेस

सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के क्रियान्वयन पर जिलों की परफार्मेंस रिपोर्ट चौंकाने वाली रही। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु गुणवत्ता कार्यक्रम में भोपाल व ग्वालियर की स्थिति सबसे कमजोर है। जबकि इन्हें बड़ी राशि मिली थी, अन्य मदों से भी काम कराए गए। करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। वहीं उक्त कार्यक्रम से बाहर वाले वाले नरसिंहपुर व सिंगरौली की स्थिति भी बहुत खराब है। पीएम स्वनिधि योजना में मुरैना व दतिया सबसे कमजोर स्थिति में है। दोनों जिलों में क्रमश: 61 और 58 फीसदी ही काम कर पाए हैं। अमृत योजना 2.0 में मुरैना व बुरहानपुर की स्थिति कमजोर रही, वहां क्रमश: 57 व 56 प्रतिशत काम हुआ है। वहीं चंबल संभाग पिछड़ा है।स्वच्छ भारत मिशन (शहरी)में दमोह व मैहर जिले ने 62 व 58 प्रतिशत काम हुआ है। ये सबसे पिछड़े जिले बताए जा रहे हैं। संभाग में ग्वालियर सबसे पिछड़ा है। पीएम आवास (शहरी)में स्वीकृत आवासों की तुलना में निर्माण पूरा कराने में अनूपपुर व दतिया सबसे पीछे चल रहे हैं। संभागों में शहडोल सबसे पीछे है।वंदना योजना में पात्रताधारियों को लाभ देने में इंदौर व मऊगंज की स्थिति सबसे कमजोर जिलों की है। संभागों में चंबल सबसे पीछे हैं।निक्षय पोषण बास्केट वितरण में आगर मालवा ने 26 व रीवा ने 25 फीसदी काम ही किया। संभागों में ग्वालियर सबसे पीछे हैं। टीबी के मामले में श्योपुर-सागर पिछड़े हैं। यहां क्रमश: 25 से 22 फीसदी ही लक्ष्य को हासिल किया जा सका। सागर संभाग के जिलों की स्थिति अच्छी नहीं है। सिकल सेल उपचार में शहडोल व खरगोन में लक्ष्य के अनुरूप मरीजों को चिह्नित व. इलाज नहीं किया जा रहा। बाल मृत्युदर रोकने में खरगोन व रायसेन जिले को बाल मृत्युदर रोकने के जो प्रयास करने चाहिए, उसमें इन जिलों का काम कमजोर है। मातृ मृत्यु दर में आगर मालवा और सिंगरौली का काम ठीक नहीं। ये मौतें रोकने के लिए जो समीक्षाएं व जरूरी कदम उठाने थे। दोनों जिलों का काम कमजोर है। मत्स्य पालन में सिंगरौली-शिवपुरी की प्रगति ठीक नहीं है।। रीवा संभाग पिछड़ा है। गोशाला मामले में सीधी व डिंडौरी पिछड़े हैं जबकि शहडोल संभाग सबसे फिसड्डी है। डॉ. भीमराव आंबेडकर कामधेनु योजना में सिंगरौली व अनूपपुर का काम ठीक नहीं है। यहां क्रमश: 12 और 18 फीसद ही काम हुए। जबकि संभागों में रीवा सबसे पीछे चल रहा है। जबकि मुख्यमंत्री का इस योजना पर जोर है। पीएम सूक्ष्म खाद्य उद्यम में निवाड़ी व ग्वालियर, लक्ष्य के विपरित ये क्रमश: 35 व 30 प्रतिशत ही काम कर पाए। संभागों में शहडोल 50 फीसदी पर अटका है। ड्रॉप मोर क्रॉप योजना में मऊगंज व मुरैना का काम ठीक नहीं है। संभागों में चंबल सबसे पिछड़ा है।

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