व्यवस्था की विडंबना : दूसरों को आवास दिलाने वाली सरपंच का अपना आशियाना अब भी अधूरा, दमोह जिले की ग्राम पंचायत “कुआंखेड़ा नायक” की सरपंच के पास न पक्का घर, न राशन कार्ड!

ब्यूरो रिपोर्ट दमोह। पंचायत इंडिया न्यूज़

दमोह। लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई ग्राम पंचायत की कमान संभालने वाली एक महिला सरपंच खुद बुनियादी सुविधाओं से वंचित जीवन जीने को मजबूर है। विडंबना यह है कि जिन सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है, उन्हीं योजनाओं का लाभ उन्हें आज तक नहीं मिल सका है। हालात ऐसे हैं कि सरपंच होने के बावजूद उनके पास न तो रहने के लिए पक्का मकान है और न ही शौचालय जैसी मूलभूत सुविधा उपलब्ध है। वे अपने परिवार के साथ पन्नी और घास-फूस से बनी एक झोपड़ी में जीवन यापन कर रही हैं, जो बारिश के मौसम में रहने लायक नहीं रह जाती और मजबूरी में उन्हें परिवार सहित किराए के घर में शरण लेनी पड़ती है।

यह मामला दमोह ब्लॉक की ग्राम पंचायत कुआं खेड़ा नायक का है, जहां की सरपंच श्रीमती मीना अठ्या सेमरपटी गांव में अपने परिवार के साथ रहती हैं। अनुसूचित जाति वर्ग से आने वाली मीना अठ्या के परिवार में लगभग 10 सदस्य हैं, जिनमें उनके पति, बच्चे, देवर, ससुर और अन्य परिजन शामिल हैं। इतने बड़े परिवार के बावजूद उनके पास रहने के लिए केवल एक अस्थायी झोपड़ी है, जो किसी भी दृष्टि से सुरक्षित या स्थायी आवास नहीं मानी जा सकती। यह स्थिति तब और भी चौंकाने वाली हो जाती है जब यह पता चलता है कि वे अपने गांव के अन्य जरूरतमंद लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, लेकिन स्वयं उन योजनाओं से वंचित हैं।

सरपंच श्रीमती मीना अठ्या ग्राम पंचायत कुआं खेड़ा नायक

सरपंच श्रीमती मीना अठ्या स्वयं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं, लेकिन अपने दायित्वों को निभाने में पीछे नहीं रहतीं। उन्होंने बताया कि बारिश के मौसम में उनकी झोपड़ी पूरी तरह से असुरक्षित हो जाती है और उसमें रहना संभव नहीं होता। ऐसे में उन्हें या तो किराए का घर लेना पड़ता है या फिर अस्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट होना पड़ता है। उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन भी किया था, लेकिन कई बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद उन्हें अब तक इस योजना का लाभ नहीं मिल सका। अधिकारियों द्वारा उन्हें यह कहकर टाल दिया जाता है कि सरपंच होने के कारण वे इस योजना के लिए पात्र नहीं हैं।

इस संबंध में उनके ससुर नाथूराम का कहना है कि हर व्यक्ति का सपना होता है कि उसका अपना पक्का मकान हो, लेकिन उन्होंने सरपंच बनने से पहले भी कई बार प्रयास किया, फिर भी उनका नाम लाभार्थियों की सूची में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि वे ज्यादा शिक्षित नहीं हैं और सरकारी प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी भी नहीं है, इसलिए अधिकारी जो कहते हैं, उसी पर भरोसा करना पड़ता है। उन्हें आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उनका नाम सूची में क्यों नहीं जोड़ा गया। इस मामले में पंचायत सचिव कमलेश खरे ने बताया कि सरपंच के परिवार के दो सदस्यों के नाम प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए प्रस्तावित किए गए हैं, लेकिन फिलहाल आवेदन प्रक्रिया लंबित है और स्वीकृति अभी नहीं मिली है।

सरपंच श्रीमती मीना अठ्या ने यह भी बताया कि उनके पास राशन कार्ड या खाद्यान्न पर्ची नहीं है, जिसके कारण उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत राशन भी नहीं मिल पा रहा है। यही कारण है कि वे मुख्यमंत्री लाडली बहना योजना का लाभ लेने से भी वंचित रह गईं, क्योंकि राशन कार्ड के अभाव में उनका पंजीकरण नहीं हो सका। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि परिवार का भरण-पोषण मजदूरी पर ही निर्भर है। परिवार के सदस्य बेलदारी, खेतिहर मजदूरी और अन्य छोटे-मोटे काम करके किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं।

स्थिति की विडंबना यह है कि गांव की प्रथम नागरिक मानी जाने वाली सरपंच, जो दूसरों के जीवन में बदलाव लाने का माध्यम हैं, स्वयं मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनके लिए सरपंच का पद सम्मान से अधिक एक ऐसी जिम्मेदारी बन गया है, जिसने उनके अपने जीवन की कठिनाइयों को कम करने के बजाय और अधिक उजागर कर दिया है।

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