स्पेशल रिपोर्ट : जल जीवन मिशन पर सवाल, छिंदवाड़ा के गांव में दो साल से सूखे पड़े हैं नल, बूंद-बूंद पानी को तरस रहे ग्रामीण!

छिंदवाड़ा से लौटकर पवन श्रीवास्तव की रिपोर्ट। पंचायत इंडिया न्यूज़

छिंदवाड़ा। विकास के बड़े-बड़े दावों और योजनाओं की चमक के बीच जमीनी हकीकत कभी-कभी इतनी कठोर होती है कि वह हर दावे को आईना दिखा देती है। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के अंतिम छोर पर बसे छोटे से आदिवासी गांव छातीआम की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां पानी आज भी किसी सुविधा नहीं, बल्कि संघर्ष का दूसरा नाम है। यहां रहने वाली करीब 65 वर्षीय कमला बाई ने अपनी जिंदगी के लगभग 60 साल पानी की किल्लत में गुजार दिए। दो साल पहले जब उनके घर के सामने पाइपलाइन बिछी और नल लगा, तो उन्हें पहली बार लगा कि अब उनकी जिंदगी में भी ‘नल से जल’ आएगा, लेकिन यह उम्मीद आज भी अधूरी है। दो साल गुजर जाने के बाद भी उस नल से एक बूंद पानी नहीं निकला।

साल 2019 में भारत सरकार द्वारा शुरू की गई जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य था कि 2024 तक देश के हर ग्रामीण घर में नल के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुंचाया जाए। योजना का प्रचार-प्रसार बड़े स्तर पर हुआ, गांव-गांव में पाइपलाइन डाली गई, घर-घर नल लगाए गए, लेकिन छातीआम जैसे कई गांव आज भी सिर्फ इन पाइपों और नलों को देखकर ही संतोष करने को मजबूर हैं। गांव की महिलाएं तंज कसते हुए कहती हैं कि “नल शायद हमें दिखाने के लिए लगाए गए हैं, इनमें पानी आने की बात अब मजाक जैसी लगती है।” हालत यह हो गई है कि उपयोग में न आने के कारण कई जगहों पर पाइप टूटने लगे हैं, और नल जंग खाकर बेकार हो रहे हैं।

गांव की प्रेमलता बाई बताती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी चिंता रोटी नहीं, बल्कि पानी है। “खाने के लिए मजदूरी कर लेते हैं, लेकिन पानी कहां से लाएं, यह सबसे बड़ा सवाल होता है।” गर्मी के दिनों में यह समस्या और भी विकराल हो जाती है। गांव में केवल एक सरकारी कुआं है, जिसमें रातभर धीरे-धीरे पानी इकट्ठा होता है। सुबह होते ही ग्रामीण वहां पहुंच जाते हैं और आपसी समझौते के तहत एक-एक कर पानी भरते हैं। कई बार घंटों इंतजार करना पड़ता है, तब जाकर परिवार के लिए पीने भर का पानी जुट पाता है। ऐसे में नहाना तो जैसे किसी विलासिता से कम नहीं रह गया है—लोग हफ्ते में एक या दो बार ही किसी तरह स्नान कर पाते हैं।

स्थिति और भी गंभीर इसलिए हो जाती है क्योंकि गांव के अधिकांश हैंडपंप सूख चुके हैं। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा पानी की समस्या के समाधान के लिए ट्यूबवेल खनन भी कराया गया, लेकिन उसमें भी पानी नहीं निकला। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां का जल स्तर लगातार नीचे जाता जा रहा है, जिससे हर साल गर्मी में हालात बद से बदतर हो जाते हैं।

ग्राम पंचायत सचिव सेवक आरसे का कहना है कि समस्या के समाधान के लिए प्रयास जारी हैं। “जल जीवन मिशन के तहत गांव में पानी की टंकी का निर्माण किया जा रहा है, जिसके पूरा होने के बाद पानी की समस्या खत्म होने की उम्मीद है। फिलहाल पाइपलाइन और नल लगाए जा चुके हैं, आगे पानी की सप्लाई सुनिश्चित करने का काम किया जा रहा है।” लेकिन ग्रामीणों के लिए यह आश्वासन अब तक सिर्फ कागजों और बातों तक ही सीमित नजर आ रहा है।

पानी की कमी अब सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट भी बनती जा रही है। गांव के कई लोगों को चर्म रोग होने लगे हैं। शरीर पर खुजली, दाने और संक्रमण की शिकायतें बढ़ रही हैं। डॉक्टरों की सलाह है कि रोजाना स्नान और साफ-सफाई जरूरी है, लेकिन जब पीने के लिए ही पानी उपलब्ध नहीं है, तो नहाना कैसे संभव हो? एक पीड़ित ग्रामीण कहता है, “डॉक्टर कहते हैं रोज नहाओ, लेकिन हम पूछते हैं—जब पानी ही नहीं है तो नहाएं कैसे?”
छातीआम गांव की यह तस्वीर न सिर्फ एक गांव की समस्या को उजागर करती है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि क्या योजनाओं का वास्तविक लाभ सही समय पर जरूरतमंदों तक पहुंच पा रहा है? यहां के लोगों के लिए ‘नल से जल’ अभी भी एक सपना है, जो कागजों में तो पूरा हो चुका है, लेकिन जमीन पर आज भी अधूरा है।

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