भोपाल से दीपेश वर्मा की रिपोर्ट। पंचायत इंडिया न्यूज़
भोपाल। मध्यप्रदेश, जिसे नदियों का मायका कहा जाता है क्योंकि यहां से देश की सबसे अधिक नदियां निकलती हैं, आज अपने ही जलस्रोतों के अस्तित्व संकट से जूझ रहा है। हालात यह हैं कि प्रदेश की 200 से अधिक छोटी नदियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं और उनकी धार लगातार सिमटती जा रही है। इनमें से कई नदियां प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली नर्मदा नदी की सहायक हैं, जिससे जल संतुलन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। हालांकि खंडवा की घोड़ा पछाड़ नदी को “रिच टू वैली” तकनीक के माध्यम से जनभागीदारी और शासकीय सहयोग से पुनर्जीवित करने जैसे प्रयास उम्मीद जगाते हैं, वहीं जबलपुर की गौर, मंदसौर की सिवना और हरदा की अजनाल सहित करीब 40 नदियों के संरक्षण कार्य जारी हैं।

नदियों पर संकट के चार बड़े कारण सामने आए हैं, अवैध रेत खनन, बड़े बांध, बढ़ता प्रदूषण और अतिक्रमण। मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश की प्रमुख नदियों जैसे चंबल नदी, क्षिप्रा नदी, बेतवा नदी, सोन नदी, ताप्ती नदी, माही नदी और सिंध नदी समेत अन्य जलधाराओं में 158 नालों के जरिए प्रतिदिन लगभग 450 मिलियन लीटर घरेलू अपशिष्ट जल छोड़ा जा रहा है, जिससे नदी तंत्र तेजी से प्रदूषित हो रहा है।

प्रदेश के विभिन्न जिलों में हालात और भी चिंताजनक हैं। डिंडौरी में कुतरेल, कसा, सिलगी और खरमेर जैसी सहायक नदियां अतिक्रमण और रेत खनन से खत्म होने की कगार पर हैं, तो जबलपुर की परियट नदी डेयरियों के अपशिष्ट से काली पड़ चुकी है। नरसिंहपुर की सींगरी नदी नाले में तब्दील हो चुकी है, जबकि छिंदवाड़ा की पेंच और कन्हान नदियां अवैध उत्खनन से बदहाल हैं। सीधी की सूखा नदी पूरी तरह सूख चुकी है और कटनी की कटनी नदी का पानी उपयोग लायक नहीं बचा।
राजधानी भोपाल भी इस संकट से अछूता नहीं है। कोहेफिजा से निकलने वाली शीरीन नदी, जो कभी मीठे पानी का प्रमुख स्रोत थी, अब गंदे नाले में बदल चुकी है। बेतवा की सहायक कलियासोत नदी अवैध निर्माण और सीवेज के चलते दम तोड़ रही है, जबकि कोलार और हलाली नदियां अतिक्रमण के कारण सिकुड़ रही हैं। पार्वती की सहायक सीवन और अजनाल नदियां भी इसी संकट से गुजर रही हैं, वहीं नर्मदा की सहायक पलकमती नदी की धार लगातार रेत उत्खनन से कमजोर पड़ती जा रही है।

इस संबंध में प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने बताया कि वे अब तक 109 नदियों के उद्गम स्थल का दौरा कर चुके हैं, जिनमें से करीब 50 के स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। उनका कहना है कि यदि बड़ी नदियों को बारहमासी बनाए रखना है, तो छोटी नदियों को भी संरक्षित करना अनिवार्य है। इसके लिए पौधारोपण और प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है, क्योंकि यही नदियों के पुनर्जीवन का आधार बन सकते हैं।
